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गुरुवार, 17 जुलाई 2014

कमजोर मानसून से बढ़ी सूखे की चिंता

पानी ब्यर्थ बह जाने के बाद खाली पड़ा गेरा नाला सिंचाई बांध की तस्वीर
बांध की लागत से दो गुना खर्च के बाद भी नहरों का काम अधूरा
हरित क्रांति लाने वाले सिंचाई बांध पानी के बगैर अनुपयोगी
 रमेश शर्मा /पत्थलगांव/      
     कमजोर मानसून को देख कर इस वर्ष किसानों को सूखे की चिंता सताने लगी है। बोनी का काम एक माह पिछड़ जाने के बाद अब किसानों की बेचैनी बढ़ते जा रही है। किसानों का कहना है कि आगे अच्छी बारिश होगी या नहीं इस बात को सोच कर वे रात को सो नहीं पा रहे हैं। मानसून के पहले बोए गए बीज खेतों में ही खराब होने की शिकायत मिल रही है। कई किसान अब दोबारा बोने के लिए बीज खरीद रहे हैं।
 सबसे बड़ी विडंबना यह है कि कम बारिश से चिंतित यहां के किसानों को करोड़ो रूपयों की लागत वाले सिंचाई बांधों से भी खरीफ फसल के लिए पानी नहीं मिल पा रहा है। जल संसाधन विभाग व्दारा इस अचंल में हरित क्रांति लाने के लिए करोड़ों रूपये खर्च कर बनाए गए 8 सिंचाई बांधों में इस समय केवल दो बांध में ही पानी उपलब्ध है। शेष बांध यहां पर सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। यहां का गेरा नाला और घरजियाबथान सिंचाई बांध का पानी नहीं सहेज कर रखने से ये दोनो बांध खरीफ फसल में किसानों के लिए अनुपयोगी साबित हो रही हैं।
      पाकरगांव के किसान गणेशचन्द्र बेहरा का कहना था कि मानसून की देरी के बाद अब हल्की बुन्दा बान्दी से खेतों की मिट्टी भी गिली नहीं हो पा रही है। ऐसे में किसान सिंचाई के लिए बेहद बेकरार हो रहे हैं। इस अचंल में अनेक किसानों ने अपने खेतों में बीज भी डाल दिए हैं, लेकिन खेतों में पर्याप्त पानी का अभाव से अभी तक बीज अंकुरित नहीं हो पा रहे हैं।

     पत्थलगांव जल संसाधन विभाग व्दारा करोड़ों रूपयों की लागत से बनाए गए सिंचाई बांधों में पानी नहीं रहने से ये बांध किसानों के लिए बेकार साबित हो रहे हैं। यहां पर 17 करोड़ रू.की लागत वाला घरजियाबथान सिंचाई बांध का निर्माण में 23 करोड़ रू. से अधिक राशि व्यय करने के बाद इस बांध में 2 साल के बाद भी नहरों का निर्माण कार्य अधूरा पड़ा है। इसी तरह जल संसाधन विभाग का गेरा नाला सिंचाई बांध में भी पानी नहीं रहने से किसानों के लिए यह बांध अनुपयोगी साबित हो रहा है। लगभग 10 करोड़ की लागत से बनाया गया इस सिचांई बांध में भी नहरों का काम अधूरा रह जाने से हरित क्रांति लाने वाले ये बांध अब सफेद हाथी बन कर रह गए हैं। सबसे बड़ी विडमंना यह है कि करोड़ों रू.की लागत से बनाए गए इन बांधों का रख रखाव के लिए जल संसाधन विभाग ने फुटी कौड़ी का भी प्रावधान नहीं रखा है। गेरा नाला सिंचाई बांध में मुख्य गेट का व्दार खराब हो जाने के बाद इसका रख रखाव के लिए महज ढाई हजार रू.का आबंटन नहीं मिल पाने से इस बांध का पूरा पानी ब्यर्थ में बह गया था। छैः माह पहले गेरा नाला बांध से ब्यर्थ पानी बहने के संबंध में आस पास के किसानों ने जल संसाधन विभाग के अधिकारियों को शिकायत भी की थी। लेकिन पत्थलगांव जल संसाधन विभाग के अनुविभागीय अधिकारी के पास इस बांध का रख रखाव के नाम पर फुटी कौड़ी का भी आबंटन नहीं रहने से मुख्य गेट पर सुधार का काम नहीं हो पाया था। गेरा नाला बांध में अब 10 प्रतिशत पानी भी नहीं बच पाया है। गेरा नाला के समीप जामझोर के सरंपच नन्द देव साय ने बताया कि गेरा नाला सिंचाई बांध से आस पास के आधा दर्जन गांवों में खरीफ और रबि की फसल को सिंचाई सुविधा मुहैया कराने का दावा किया गया था। लेकिन यह दावा केवल कागजी बन कर रह गया है। नन्द देव ने बताया कि गेरा नाला सिंचाई बांध का काम पूर्ण करने का दावा तो किया गया है लेकिन यहां पर कोकियाखार तथा अन्य नहरों का काम आज भी अधूरा पड़ा है। उन्होने बताया इस समय आस पास के किसान अल्प वृष्टि से खासे परेशान हैं। यहां पर करोड़ों रू.की लागत का सिंचाई बांध और नहरों का जाल बिछ जाने के बाद भी पानी के अभाव में गेरा नाला बांध अनुपयोगी साबित हो रहा है।
         लापरवाह अधिकारी पर दंडात्मक कार्रवाई जरूरी
     बागबहार के भाजपा नेता आनंद शर्मा का कहना था कि महज 2 हजार रू.का आबंटन नहीं मिल पाने से गेरा नाला सिंचाई बांध का समूचा पानी ब्यर्थ बह जाना बेहद दुर्भाग्य की बात है। इसमें जल संसाधन विभाग के अधिकारी की लापरवाही अधिक झलकती है। ऐसे अधिकारियों के विरूध्द शासन को दंडात्मक कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होने कहा कि गेरा नाला सिंचाई बांध का पानी यदि ब्यथ नहीं बहता तो इस पानी से जामझोर ,कोकियाखार आदि गांव के सैकड़ों एकड़ भूमि में अल्पवृष्टि के बाद भी खरीफ की फसल का लाभ मिल सकता था। उन्होने कहा कि गेरा नाला सिंचाई बांध की नहरों का निर्माण पर करोड़ों रू.का व्यय करने के बाद आज भी कोकियाखार क्षेत्र में नहरों का काम अधूरा पड़ा है।श्री शर्मा ने कहा कि गेरा नाला सिंचाई बांध का निर्माण कार्य के दस्तावेजों की जांच करने से यहां पर करोड़ों रू.की वित्तिय अनियमितता का खुलासा हो सकता है।
गेरा नाला सिंचाई बांध का मुख्य गेट रख रखाव के अभाव में बह गया पानी 
          सिंचाई बांधों का रख रखाव में आबंटन की कमी
   यहां जल संसाधन विभाग के सहायक यंत्री एसके धमिजा ने बताया कि यहां बनाए गए सिंचाई बांधों का रख रखाव के लिए आंबटन का प्रावधान नहीं होने से उन्हेa काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। श्री धमिजा ने बताया कि यहां के 8 सिंचाई बांध में केवल दो बांध में ही खरीफ फसल के लिए सिंचाई का पानी उपलब्ध है। उन्होने बताया कि यहां पर किसी भी सिंचाई बांध में चौकीदार रखने का प्रावधान नहीं होने से इन दिनो सिंचाई के लिए पानी का गेट भी नहीं खुल पा रहा है। सिंचाई बांध के आस पास के किसान स्वयं देखरेख करने से यहां पर मौजूदा हालात को अच्छा नहीं कहा जा सकता है।


बुधवार, 9 जुलाई 2014

मानसून की बेरुखी से किसान मायूस

अंचल में सूखे के हालात 
50 फीसदी से भी कम बारिश
पत्थलगांव/रमेश शर्मा
        इन दिनो कमजोर मानसून के कारण अभी भी किसानों के खेत सूखे पड़े हैं। बीते वर्ष की तूलना में इस वर्ष 200 मिमी.वर्षा कम होने से सूखे के हालात बनते जा रहे हैं। बारिश के अभाव में धान के खेतों में बड़ी बड़ी दरार दिखने लगी हैं। धान की फसल को बर्बादी के कगार पर देख कर किसान मायूस हो गए हैं।
     पिछले दिनो दो बार हुई हल्की बूंदा बांदी के बाद 50 फीसदी से अधिक किसानों ने खेतों में बोनी का काम कर डाला है। कुछ किसानों ने तो यहां मानसून की दस्तक से पहले ही अपने सूखे खेतों में बोवाई का काम पूरा कर लिया था। अब मानसून की दगाबाजी के कारण इन किसानों के बीज खेतों में ही खराब होने लगे हैं। खेतों में दरार देख कर कई किसानों को कर्ज के भुगतान की चिंता बढ़ गई है।
     पत्थलगांव तहसील में अब तक 173.0 मिमी वर्षा का रिकार्ड है, बीते वर्ष इसी अवधि में यहां 371.6 मिमी.वर्षा दर्ज की गई थी। इस साल अल्पवृष्टि के चलते पिछले वर्ष की औसत वर्षा से 50 फीसदी से भी कम बारिश है। विलंब से शुरू हुई मानसून के बाद इस अचंल के किसानों ने आनन फानन में अपना खेती किसानी का काम शुरू करके खेतों में बीज डाल दिए थे। इन किसानों के खेतों में धान के बीज अंकूरित तो हो गए हैं लेकिन सूखे के कारण ये पौधे अब दम तोड़ने लगे हैं। मानसून की दगाबाजी से किसानों की उम्मीद पर ही पानी फिर गया है।
      पाकरगांव के किसान गणेशचन्द्र बेहरा  तिलडेगा के मनोज अम्बस्थ , धनसाय, बीरिक साय तथा पुरानी बस्ती के किसान बाबा महाराज का कहना है कि इस बार  मानसून साथ नहीं देने के कारण यहां खेती किसानी का काम एक पखवाड़ा पिछड़ गया है। अल्पवृष्टि के चलते यहां पर केवल टयूबवेल वाले किसानों की ही फसल ठीक है, लेकिन वर्षा आधारित किसानों की हालत खराब है। इन दिनों अचंल के ज्यादातर किसान अपने खेतों में फसल की बर्बादी को देख कर मायूस हो गए हैं।
  दरअसल इस अचंल में ज्यादातर किसानों के पास खेतों में सिंचाई करने के लिए टयूबवेल,सिंचाई नहर तथा अन्य साधन नहीं होने के कारण उन्हें इस वक्त मानसून की दगाबाजी काफी भारी पड़ रही है। इस अचंल के किसानों का कहना है कि अब यदि मूसलाधार बारिश होगी तो भी फसल का उत्पादन प्रभावित होगा।
            मूसलधार बारिश की जरूरत 
     यहां घरजियाबथान के किसान डीआर यादव का कहना था कि यहां पर काफी विलंब से पहुंचा मानसून के बाद अब तक हुई बारिश से खेतों की जमीन भी गीली नहीं हो पाई है। इस वक्त धान की बेहतर फसल के लिए मूसलाधार बारिश का होना बेहद जरूरी हे। मानसून की दस्तक देते ही जिन किसानों ने खेतों में बोनी कर दी थी वहां अब पानी के बिना बीज खराब हो रहे हैं। यदि ऐसी ही स्थिति रही तो किसानों को दोबारा बुवाई करनी पड़ सकती है।  मानसून की दगाबाजी को देख कर कृषि विभाग का अमला भी खामोश हो गया है।
   यहां वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी श्रीमती अनिता एक्का का कहना है कि बारिश नहीं होने से किसानों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक बात है। उन्होंने कहा कि अर्ली वेरायटी के बीज का उपयोग करने वालों को नुकसान की कम संभावना है।

शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

आलू की फसल ने किसानों को डूबोया

पंड्रापाठ क्षेत्र में आलू की फसल
 खेतों में खराब आलू की फसल से किसान मायूस
  पत्थलगांव/ रमेश शर्मा   

     नियत समय पर आलू की फसल खेतों से बाहर नहीं निकलने के कारण अब किसानों को आधी से भी कम फसल पर ही सन्तोष करना पड़ रहा है। कई किसानों को इस बार खरीफ की आलू फसल ने कर्ज के नीचे डूबा दिया है। पंड्रापाठ क्षेत्र में इस बार खरीफ के मौसम में बारिश के कारण कमजोर आलू फसल के खरीदने में बाहर के व्यवसायी भी कतराने लगे हैं।

    बगीचा तहसील का पंड्रापाठ क्षेत्र में 13 ग्राम पंचायत के दो दर्जन से अधिक गांवों के सैकड़ों किसानों ने खरीफ के मौसम वाली आलू की पैदावार ली है। बारिश की वजह से 60 से 70 दिन के भीतर नीकलने वाली आलू की फसल की 20,25 दिन विलंब से कोड़ाई होने के चलते लगभग 60 प्रतिशत नुकसान की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। खेतों से फसल निकालने में देरी हो जाने की वजह यह फसल खेतों में ही खराब हो गई है।

   इस बार प्राकृतिक विपदा ने यहां के सैकड़ों किसानों को कर्ज में डूबा दिया है। पंड्रापाठ के घोरडेगा गांव में लगभग 55 एकड़ भूमि पर आलू की फसल लेने वाले किसान अषोक यादव ने बताया कि लगातार हो रही बारिश के चलते वे अपने खेतों में तैयार हो चुकी आलू की फसल को समय पर नहीं निकाल पाए ।आलू की फसल को 20 से 25 दिन विलंब के साथ निकालने पर लगभग 60 फीसदी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस किसान ने बताया कि यहां पर खरीफ के मौसम में आलू की फसल 60 से 70 दिन के भीतर तैयार हो जाती है।  इस  फसल को नियत समय पर खेतों से नहीं निकालने पर मिटटी में ही आलू की फसल खराब होने लगती है। अषोक यादव का कहना था कि पिछले पखवाड़े लगातार बारिश होने से वे आलू की फसल को नियत समय पर खेतों से बाहर नहीं निकाल पाए हैं। देरी हो जाने के बाद यह फसल मिटटी की नमी से खेतों में ही गलने लगी है।

पंड्रापाठ क्षेत्र में आलू की फसल 
    पंड्रापाठ क्षेत्र में ही रौनी के किसान गौरी गुप्ता का कहना था कि अधिक बारिश के चलते यहां पर आलू की फसल में पहले फंगस का रोग लग गया था। आलू के पौधों में इस रोग का उपचार करने के नाम पर भारी भरकम खर्च करना पड़ा था। इसके बाद भी आलू का रोग से पौधे का तना में गलन शुरू होकर डंठल भी प्रभावित हुई है। इस किसान का कहना था कि यहंा पर बे मौसम की बरसात ने किसानों की कमर तोड़ दी है। यहंा देवडाड़, मुढ़ी, सुलेषा, महनई, छिछली सहित 13 ग्राम पंचायतों के 30 से अधिक आश्रित गांवों में आलू फसल का अलग ही नजारा दिखाई पड़ रहा था । यहंा पर किसानों के खेतों में आलू की अच्छी पैदावार होने के बाद भी उन्हे इसका लाभ से वंचित रहना पड़ रहा है।

    पिछले कई वर्षो से आलू की पैदावार लेने वाला ग्राम घोरडेगा का किसान अषोक यादव का कहना था कि खाद और बीजों में महंगाई का प्रभाव के चलते इस वर्ष आलू की फसल में प्रति एकड़ की लागत 35 हजार रूपयों से बढ़ कर 60 हजार तक पहुंच गई है, पर मौसम का साथ नहीं मिल पाने से इस वर्ष यहंा आलू की खेती घाटे का धंधा साबित हो रहा है। पंड्रापाठ क्षेत्र में आलू की फसल लेने वाले किसानों का कहना था कि जिन खेतों में 50 बोरी आलू बीज लगाया गया था वहां पर अब मुष्किल से 20 बोरी ही आलू की फसल निकल पा रही है। आलू की पैदावार लेने वाले किसानों की सबसे बड़ी परेषानी यह है कि खेतों से फसल निकालने के लिए उन्हे खुला मौसम की जरूरत पड़ती है। आलू की पैदावार खेतों से निकालने के बाद पानी में भीेंग जाने से यह फसल दो तीन दिन के बाद ही गलने और काली पड़ने लगती है। इस समस्या के चलते बाहर के खरीददार भी यहंा आलू के सौदे करने से कतरा रहे हैं। बगीचा क्षेत्र में इन दिनो सैकड़ो क्विंटल आलू खेतों में रह जाने से यहां करोड़ों रूपयों का नुकसान की बात कही जा रही हैं।

                       आलू पर भारी पड़ी बारिश

 बगीचा के कृषि उद्यान अधीक्षक सीआर चैहान ने बताया कि पिछले दिनों अधिक वर्षा के चलते पंड्रापाठ क्षेत्र में आलू की फसल आद्रगलन रोग की चपेट में आ गई थी। अब बारिश थमने के बाद खेतों से आलू की फसल निकालने में विलम्ब हो गया है। उन्होंने बताया खरीफ मौसम की आलू फसल खेतों से निकालने में थोड़ी देर हो जाने से यह फसल नमी के चलते खेतों में ही खराब होने लगी थी। श्री चैहान ने बताया कि बगीचा क्षेत्र का पठारी इलाका में लगभग 700 हेक्टेयर भूमि पर खरीफ आलू की पैदावार ली जाती है। इस बार आद्रगलन और फसल निकालने में विलम्ब हो जाने से नुकसान की सम्भावना देखी जा रही है।              

               नहीं मिलता मोबाइल पर कृषि मैसेज

 बगीचा क्षेत्र के किसानों का कहना था कि कृषि विभाग का सूचना तंत्र महज दिखावा साबित हुआ है। किसानों व्दारा खेती से संबंधित अपनी समस्याओं के लिए मोबाइल से मैसेज करने पर उन्हे कोई मदद नहीं मिल पाती है। यहां पर तिलडेगा के उन्नतशील किसान मनोज अम्बस्थ ने बताया कि खरीफ फसल पर कीट प्रकोप और प्राकृतिक विपदा ने अनेक किसानों के माथे पर चिंता की लकीर बढ़ा दी है। इस किसान का कहना था कि धान तथा अन्य खेती के बारे में कृषि वैज्ञानिकों से उचित सलाह नहीं मिल पा रही हैं। किसानों व्दारा मोबाइल पर मैसेज करने के बाद कृषि विभाग का सूचना तंत्र से कोई जवाब नहीं मिल पा रहा है। किसानों में कृषि विभाग का अमला की इस दिषा में बेरुखी को लेकर काफी आक्रोश व्याप्त है।



मंगलवार, 19 मार्च 2013

हेंडपम्प उगलने लगे लाल पानी


ग्राम पंचायत कुकरीचोली के हेंडपम्प का लाल पानी
पत्थलगांव/  रमेश शर्मा
  छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में गर्मी की शुरुआत से पहले ही जल स्तर में डेढ़ से दो फीट की गिरावट के साथ कई हेंडपम्पों में दूषित लाल पानी निकलने की समस्या सामने आने लगी है। इस वर्ष ग्रामीण अचंल के लोगों के सामने जल स्तर में गिरावट के चलते पीने का पानी की समस्या के साथ हेंडपम्पों से मिलने वाली दूषित पानी ने चिंता बढ़ा दी है। लोक स्वास्थ्य यात्रिकी विभाग ने पत्थलगांव विकासखंड के दो दर्जन से अधिक गांवों में लाल पानी उगलने वाले हेंडपम्पों को चिन्हित कर इस पानी को सेवन नहीं करने की बात कही है।
   ग्रामीण अचंल में दूर दराज के गांवों में दूषित पानी देने वाले हेंडपम्पों की समस्या का समाधान नहीं हो पाने से ग्रामीणों को इसी पानी को छान कर पीने के उपयोग में लेना पड़ रहा है। समीप ग्राम खरकटटा के स्कूल परिसर के हेंडपम्प में लाल पानी निकलने की समस्या का समाधान नहीं हो पाने के बाद स्कूल समिति के सदस्यों ने लाल पानी उगलने वाला हेंडपम्प को उखाड़ कर अलग कर दिया है। यहां के ग्रामीणों का कहना था कि मध्यान भोजन के बाद स्कूली बच्चों को इसी हेंडपम्प का दूषित पानी पीना पड़ता था। इससे बच्चों व्दारा अक्सर पेट दर्द की षिकायतों के बाद हेंडपम्प को बन्द कर दिया गया है।
                दूषित पानी की समस्या
  यहां पर तमता का बथानपारा, ग्राम जामजुनवानी का नरवा टिकरा, जामझोर का स्कूल पारा, पगंषुवा, कुकरीचोली के समीप मठपहाड़ एवं खमतराई तथा राजाआमा का स्कूलपारा में लाल पानी उगलने वाले हेंडपम्प की समस्या से आसपास के लोग खासे परेषान हैं। तमता के निवासी भास्कर शर्मा ने बताया कि यहां पर बथानपारा के हेंडपम्प में लाल पानी निकलने की समस्या के बारे में कलेक्टर को पत्र लिख कर अवगत कराया जा चुका है। उन्होने कहा कि पीने का स्वच्छ पानी के बदले दूषित पानी की इस समस्या का निराकरण के लिए त्वरित ध्यान देना चाहिए। ग्राम पंचायत कुकरीचोली के दो हेंडपम्पों में लाल पानी की समस्या के बाद भी वहंा के ग्रामीणों को इसी पानी को छान कर पीना पड़ रहा है। यहां के ग्रामीण तीरथ मोहन ने बताया कि आसपास पीने का पानी के लिए अन्य साधन नहीं होने से उन्हे इसी पानी का सेवन करना पड़ रहा है। इस गांव में दूषित पानी के चलते अनेक लोगों व्दारा पेट दर्द और दांतों में कालापन दिखने की परेषानी आ गई है। हेंडपम्प की समस्या को लेकर यहां के सरपंच ने लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों को लिखित षिकायत कर दी है। इसके बाद भी लाल पानी की समस्या यथावत है।
 दो दर्जन हेंडपम्पों से निकल
 रहा है लाल पानी
   यहां लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अनुविभागीय अधिकारी सीबी सिंग ने बताया कि यहां गर्मी की शुरूआत के पहले ही भू-जल स्तर में गिरावट दिखने लगी है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में दो फीट तक जल स्तर नीचे चला गया है। उन्होने बताया कि इस समस्या से निपटने के लिए हेंडपम्प में पाइप बढ़ाए जा रहे हैं। श्री सिंग ने बताया कि यहां के अलग अलग गांवों में दो दर्जन से अधिक हेंडपम्पों में लाल पानी उगलने की समस्या सामने आई है। इन सभी हेंडपम्पों का परीक्षण करने के बाद उन्हे चिन्हित कर उसका पानी को पीने के उपयोग में नहीं लेने को कहा गया है। श्री सिंग ने बताया कि संबंधित ग्राम पंचायत के सरपंच और सचिव को लाल पानी उगलने वाले हेंडपम्पों का पानी के लिए आवष्यक सतर्कता बरतने को कहा गया है। उन्होने कहा कि लाल पानी की समस्या से प्रभावित गांवों के लिए विशेष कार्य योजना बना कर उच्च अधिकारियों के पास जानकारी भेज दी गई है।
              लाल पानी की समस्या से प्रभावित गांव
  पत्थलगांव क्षेत्र के दो दर्जन से अधिक गांवों में हेंडपम्प का लाल पानी लोगों की परेषानी का सबब बन गया है। यहां पर कुकरीचोली ग्राम पचंायत में तीन हेंडपम्पो से लाल पानी निकल रहा है। इसी तरह खरकटटा और कुड़केलखजरी के लोग भी हेंडपम्प से लाल पानी की समस्या को लेकर खासे नाराज हैं। लोक स्वास्थ्य यात्रिकी विभाग ने ग्राम पंचायत तमता बथानपारा, पण्डरीपानी उपरपारा, कुड़केलखजरी पटेलपारा, कुड़केलखजरी बैगापारा, बेलडेगी स्कूलपारा, तिलडेगा शांतिपारा, कुकरीचोली खमतराई, कुकरीचोली उरांवपारा, कुकरीचोली मठपहाड़, लोकेर बिछीकानी, जमरगी बी झिंगरेल, जामझोर मंदिरपारा, गोलियागढ़ मुख्य बस्ती, पंगषुवा बसंतपुर, खरकटटा स्कूलपारा, खरकटटा दर्रीमहुआ, जामजुनवानी नरवाटिकरा, राजाआमा स्कूलपारा के हेंडपम्प का पानी को दूषित बता कर इसका सेवन नहीं करने की जानकारी दी है।
              स्वास्थ्य के लिए हानिकारक लाल पानी
  यहां सिविल अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक पुरुषोत्तम सुथार ने बताया कि हेंडपम्प से निकलने वाला लाल पानी को छान लेने के बाद भी वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रहता है। उन्होने कहा कि इसमें फलोराइड की मात्रा अधिक होने के कारण इस पानी का रंग लाल हो जाता है। उन्होने कहा कि लाल पानी का सेवन करने से पेट दर्द तथा अन्य बीमारियों की सम्भावना बनी रहती है। इससे दांत, कमर की हड्डी प्रभावित होने का भी अंदेषा रहता है।