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रविवार, 23 मार्च 2014

महिलाओं ने की शीतला माता की पूजा.अर्चना

महिलाओं ने विधि विधान से की 
         शीतला माता की आराधना 
सूर्योदय से पहले बासी भोजन से होती है शीतला माता की पूजा
 पत्थलगांव/         रमेश शर्मा
    रोग मुक्ति और शांति प्राप्ति के लिए रविवार और सोमवार को सूर्योदय से पहले महिलाओं ने मां शीतला को बासी भोजन का भोग लगाकर श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी आराधना की।
     शहर में सुता तालाब के समीप शीतला माता का वर्षो पुराना मंदिर बना हुआ है। यहां पर भोर से ही पूजा अर्चना करने वालों की लम्बी कतार लग गई थी। शीतला सप्तमी के अवसर पर श्वेत पाषाण रूपी मां के पूजन की प्राचीन परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता का विधि विधान से पूजन करने के बाद पूरे साल भर तक परिवार में शांति और शीतलता बनी रहती है।
      होली का त्योहार के सातवें दिन गृहणियों व्दारा इस पूजा के लिए एक दिन पहले ही मीठे चावल के साथ विभिन्न व्यंजन तैयार किए जाते हैं। यहां मारवाड़ी महिलाओं में ऐसी परंपरा है कि होलिका दहन के पश्चात वहां से ठंडी राख घर में लाई जाती है। इसके बाद सप्तमी अथवा प्रथम सोमवार व गुरुवार को शीतला माता की पूजा अर्चना की जाती है।
           बासी भोजन व चूल्हा ठंडा रहने की परम्परा
     यहां मारवाड़ी महिला मंडल की अध्यक्ष श्रीमती चन्दा गर्ग का कहना है कि भगवती शीतला की पूजा का विधान बहुत ही विशिष्ट है। शीतला सप्तमी के दिन उन्हें पूरी शुद्धता के साथ बनाया हुआ बासी भोजन का भोग लगाया जाता है। यही वजह है कि इस पर्व को उत्तर भारत में बासौड़ा के नाम से भी जाना जाता है। श्रीमती गर्ग का कहना था कि इस त्यौहार पर बासी भोजन खाने की परम्परा थोड़ा चौकाती हैं, लेकिन इसके पीछे तर्क यह है कि इस समय से वसंत की विदाई होती है और ग्रीष्म का आगमन होता है।इसलिए आगे बासी भोजन से परहेज करना चाहिए। यहा श्रीमती नंदा शर्मा और मान्या शर्मा ने बताया कि शीतला पूजा के दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता है। वर्षो पुरानी इस परम्परा को आज भी पूरे आस्था और विश्वास के साथ पालन किया जाता है।


गुरुवार, 31 अक्टूबर 2013

विलुप्ति के कगार पर कार्तिक स्नान की परम्परा



शहर के मध्य में स्थित गंदगी से पटा सुता तालाब
पत्थलगांव/ रमेश शर्मा
         बदलते दौर में युवाओं के साथ बुजुर्गो ने भी भोर के समय कार्तिक स्नान की पुरानी परम्परा को भुला दिया है।
   कस्बे और गांवों में तालाबों का अस्तित्व गुम हो जाने के कारण ज्यादातर लोग चाहते हुए भी इस परम्परा का निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं। यहां की बुजुर्ग महिला राधा बाई पटेल का कहना था कि कार्तिक मास में दिन के पहले पहर में स्नान कर भगवान षिव की पूजा अर्चना का काम को अब भुला दिया गया है। पहले शरद पूर्णिमा से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक पूरे एक माह तक प्रतिदिन नदी और सरोवर में स्नान कर जल में दीप प्रज्ज्वलित किए जाते थें। आधुनिकता के दौर में वर्षो पुरानी यह परम्परा धीरे धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है।
    कस्बों के साथ गांवों में भी तालाबों का अस्तित्व नहीं बच पाने से वहां के लोग कार्तिक स्नान की धार्मिक परम्परा में रूचि नहीं दिखा रहे हैं। पुराने बुजुर्ग कार्तिक स्नान की परम्परा को आज भी याद तो करते हैं पर आस पास में तालाब और नदी का अभाव के चलते वे केवल याद करके ही रह जाते हैं। यहां के व्यवसायी सुरेश अग्रवाल का कहना था कि पहले कार्तिक का महीना प्रारम्भ होते ही सुबह 4 बजे लोग अपने घर से स्नान के लिए निकल पड़ते थे। उस दौरान ठंडे पानी में स्नान के बाद जल में दीप प्रज्ज्वलित करने का नजारा देखते ही बनता था। भोर के समय कार्तिक स्नान के लिए तालाब में दूर दूर के लोग पहुंचकर दीपदान करके तालाब के आस पास मनोरम दृष्य बन जाता था।
             स्वस्थ जीवन की अच्छी परम्परा       
     यहां के नवीन होत्ता ने बताया कि आधुनिकता के चलते अब पुरानी परंपरा को विलुप्त कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि कार्तिक स्नान की परम्परा के पीछे धार्मिक कारण से अधिक अच्छे स्वास्थ्य पर ध्यान देने की आदत बनती थी।श्री होत्ता ने कहा कि गुलाबी ठंड में प्रातः का स्नान स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहतर रहता था। तालाब अथवा नदी में दीप प्रज्ज्वलित करने के बाद चावल आदि से भगवान षिव की पूजा अर्चना करने से आसपास के जीव जन्तुओं को भोजन मिलता था। इससे तालाब का पानी भी स्वच्छ रहता था। भोर में कार्तिक स्नान के बहाने लोगों को जल्दी उठने की आदत बन जाती थी पर अब आधुनिकता ने बुजुर्गो व्दारा दी गई अच्छी परम्पराओं को भुला दिया जा रहा है।उन्होने कहा कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए इन परम्पराओं को जीवित रखना बेहद जरूरी है।

गुरुवार, 9 मई 2013

प्याऊ की परम्परा को बचाना होगा


मंगलवार को बस स्टैण्ड पर प्याऊ का लोकार्पण

परोपकार के कार्यो को युवा आत्मसात करें
 पत्थलगांव/
  चिलचिलाती धूप में राहगीरों को ठंडा पानी पिलाना ही सबसे बड़ा पुण्य और पूजा का कार्य है। हमारे बुजुर्गो व्दारा वर्षो पहले शुरू की इन पुरानी परम्पराओं के पीछे परोपकार की भावना के साथ नई पीढ़ी को भी भलाई के कार्यो हेतु प्रेरित करना होता है। जरूरतमंद लोगों को लाभान्वित करने वाली इन परम्पराओं को किसी भी हालत में लुप्त नहीं होने देना चाहिए। शहर की प्रमुख समाजसेवी महिला श्रीमती गीतादेवी शर्मा ने बस स्टैण्ड पर प्याऊ का लोकार्पण के दौरान उक्त बातें कही। उन्होने कहा कि स्वच्छ एवं ठंडा पानी के प्याऊ को गन्दगी से बचाने के लिए आस पास के लोगों को ध्यान देने की जरूरत है। श्रीमती शर्मा ने कहा कि प्याऊ खोलन के बाद उस स्थान पर स्वच्छता के काम को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।इसलिए प्याऊ खोलने के बाद उसकी साफ सफाई पर भी समुचित ध्यान देना चाहिए।
   श्रीमती शर्मा ने कहा कि नगर पचंायत को शहर में खोले गए प्याऊ के आसपास साफ सफाई के साथ वहॉं हर समय स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने के काम को जिम्मेदारी के साथ पूरा करना चाहिए। पत्थलगांव बस स्टैण्ड पर यात्रियों को ठंडा पानी मुहैया कराने के लिए नगर पचंायत उपाध्यक्ष श्रीमती स्नेहलता शर्मा ने पहल की है। श्रीमती शर्मा ने यहाँ बस यात्रियों की परेशानी के मददेनजर अपने पार्षद मद की राषि से प्याउ की ब्यवस्था कराई है। यहाँ के बस स्टैण्ड पर प्रति दिन लगभग 200 से अधिक यात्री बसों की आवाजाही होती है। यहाँ पर देर रात को पहुंचने वाली लम्बी दूरी के बस यात्रियों को पानी के लिए कई बार इधर उधर भटकना पड़ जाता है। ऐसे यात्रियों को इस प्याऊ से काफी लाभ मिल सकेगा।

गुरुवार, 7 जून 2012

मानसून को मनाने किसानों ने की पूजा


मानसून के लिए पूजा करते किसान
 देरी से किसान चिंतित
 पत्थलगांव/छत्तीसगढ़/ 
 रमेश शर्मा
      आषाढ़ का महीना शुरू होने के बाद अब अचंल के किसान राहत देने वाली मानसून की बारिश का बेसब्री से इंतजार करने लगे हैं।
   किसानों का कहना है कि यदि आषाढ़ की शुरुआत के साथ मानसून आ जाता है तो उत्तम खेती होती है। इस वर्ष आषाढ़ का महीना शुरू होने के बाद भी मानसून का अता पता नहीं होने से गांव में किसानों की चिंता बढ़ने लगी है। बुधवार को ग्राम पचंायत खुंटापानी के ग्रामीणों ने आसमान में पानी के मेघा को  जल्दी बुलाने के लिए सरना स्थल पर कई घंटे तक पूजा अर्चना की। इन ग्रामीणों का मानना है कि गांव का प्राचीन सरना देव की पूजा अर्चना करने से जल्द बारिश हो जाती है।
      खुंटापानी गांव का मुखिया शिवचरण सिंह ने बताया कि आषाढ़ का महीना प्रारम्भ हो जाने के बाद भी आसमान में पानी वाले मेघा का नामोनिषान नहीं दिखाई दे रहा है। लगातार चिलचिलाती धूप, तपिश,  उमस और रात को भी भीषण गर्मी से किसानों का खेती का काम पिछड़ने लगा है। षिवचरण का कहना था कि किसानों ने अपने खेतों में हल चला कर खाद डालने का काम पूरा कर लिया है। अब किसानों को केवल पानी वाले बादलों का बेसब्री से इन्तजार है। इन किसानों का कहना था कि यदि आषाढ़ की शुरुआत में ही बारिश हो जाती है तो अच्छी फसल होती है।
     नवतपा समाप्त हो जाने के बाद भी मानसून का आसार नहीं दिखने से इन किसानों के माथे पर चिन्ता की लकिरें स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी। इन दिनो भीषण गर्मी के चलते गांव में सभी तालाब, कुंए और हेण्डपम्प सूख चूके हैं। किसानों को अपने मवेषियों को पानी पिलाने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।प्रति वर्ष मानसून की देरी और अल्प वर्षा के चलते कई किसान खेती के कामकाज से विमुख हो गए हैं। किसानों का कहना था कि बारिश में देरी के चलते फसल की गुणवत्ता पर भी विपरित असर पड़ता है। यदि समय पर मानसून आ जाता है तो किसानों की खुषी दोगुनी हो जाती है।
     ग्राम पचंायत खुंटापानी में बुधवार को गांव के बाहर सरना स्थल पर सुबह से ही चहल पहल बढ़ गई थी। सरना स्थल पर सभी छोटे बड़े किसान पहुंचने के बाद स्थानीय बैगा मनीराम ने यहंा पर पेड़ों की पूजा शुरू की थी। सरना स्थल पर पहुंचने वाला प्रत्येक किसान अपने घर से एक मुट्ठी चांवल लेकर पहुंचा था। मिटटी के नए घड़े में पानी लाकर यहंा प्राचीन परम्परा के साथ गांव में हरियाली की कामना के लिए काफी धूमधाम के साथ पूजा की जाती है। 
मानसून का इंतजार , बारिश के लिए ग्रामीणों ने की पूजा
  गरजो मेघ , बरसो मेघ .... 
     यहां पर पूजा करने वाले बैगा मनीराम ने बताया कि इस सरना स्थल पर जब भी पानी वाले मेघा के लिए पूजा की गई है तो महज एक सप्ताह के भीतर बारिश अवष्य हुई है। यहंा के ग्रामीणों का कहना था कि इस बार मानसून आने में देरी हो रही है।इसी वजह किसानों की चिन्ता बढ़ते जा रही है। किसानों का कहना था कि धान की खेती के लिए इस समय बारिश का होना बेहद जरूरी है। गांव के किसान इन दिनों बारिश के लिए इन्द्रदेवता को टकटकी लगाए बैठे हैं। मगर अभी आसमान में बारिश वाले मेघ का कहीं पता नहीं लग पाया है। इस गांव के बुजुर्ग किसान बहादुर राम ने बताया कि मानसून के पहले हवा की दिषा से बरसात होने का संकेत मिल जाता है। इस बार हवा का रूख से भी मानसून का पता नहीं चल पाया है। थक हार कर इन किसानों ने अपनी प्राचीन परम्परा की सुध ली है। सरना स्थल पर एकत्रित सभी किसान एक ही बात के लिए दुआ कर रहे थे  गरजो मेघ बरसो मेघ...
 रमेश शर्मा